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प्रभु से दो टूक बात
A Monologue with a Reluctant God

by Dr. Sushil Fotedar

क्यों चुप बैठे हो तुम 

एक खुले घाव की तरह
मेरे अंतर को कुरेदती हुई 
तुम्हे पाने की प्यास 
क्या तुम्हे दिखाई नहीं देती 
मेरी आहत अस्मिता से रिसती हर बूँद 
एक अनंत व्यथा की 
गवाही दे रही है 
पर जीवन का आधार कहलाने वाले 
निर्जीव 
मूक 
निस्तब्ध 
क्यों पत्थरों में छुपे बैठे हो तुम 
क्यों चुप बैठे हो तुम 

चहुदिशाओं में फैले 
संसार के विस्तार से लेकर 
मन की विचित्र गहराइयों में 
मैंने तुम्हे खोजा है 
चेतना को 
परत दर परत छीलकर 
तुम्हे टटोलने की कोशिश मैंने की है 
पर हर बार 
एक काले अन्धकार से टकराकर 
मैं अंग-अंग
टूट चुका हूँ 
क्यों शून्य का कवच ओढ़े हो तुम 
क्यों चुप बैठे हो तुम 

एक नटखट बालक की तरह 
लीलाएं तुम करते हो 
कैसी विडम्बना है 
और मुझसे आशा है 
कि गहन गंभीरता से 
कर्मों का बोझ ढोता रहूँ 
गिडगिडाने पर ही तुम 
कृपा की बरसात करते हो 
क्यों ज़रुरत है तुम्हे 
बार -बार 
महानता का एहसास दिलाने की 
क्यों दुष्टों  सा व्यवहार करते हो तुम 
क्यों चुप बैठे हो तुम 

क्यों चुप बैठे हो तुम

 

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